वॉशिंगटन/नई दिल्ली।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक राजनीति में एक बार फिर हलचल मचा दी है। गाजा और यूक्रेन जैसे युद्धग्रस्त इलाकों में शांति स्थापित करने के नाम पर ट्रंप ने एक नया और विवादित फॉर्मूला पेश किया है — ‘बोर्ड ऑफ पीस’। इस प्रस्ताव के तहत दुनिया के ताकतवर देशों को शांति क्लब का सदस्य बनने के लिए 1 बिलियन डॉलर (करीब 8,200 करोड़ रुपये) चुकाने होंगे। सवाल यह है कि क्या भारत इस वैश्विक ‘शांति बोर्ड’ का हिस्सा बनेगा?
क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप ने एक अंतरराष्ट्रीय मंच बनाने का प्रस्ताव रखा है, जिसका उद्देश्य युद्धों को रोकना या मध्यस्थता के ज़रिए खत्म करवाना है। इस बोर्ड में शामिल देश न केवल रणनीतिक फैसलों में भाग लेंगे, बल्कि अमेरिका की अगुवाई में शांति मिशनों को आर्थिक सहयोग भी देंगे।
$1 बिलियन की ‘शांति फीस’
ट्रंप का दावा है कि अमेरिका पहले से ही वैश्विक संघर्षों में भारी संसाधन झोंक रहा है, ऐसे में जो देश शांति प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहते हैं, उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। प्रस्तावित फीस 1 बिलियन डॉलर रखी गई है, जिसे ट्रंप “शांति में निवेश” बता रहे हैं। आलोचक इसे सीधे तौर पर ‘Pay to Stop War’ मॉडल करार दे रहे हैं।
गाजा और यूक्रेन पर ट्रंप की नजर
ट्रंप का कहना है कि यदि यह बोर्ड सक्रिय होता है, तो गाजा युद्ध और यूक्रेन-रूस संघर्ष जैसे मुद्दों पर तेज़ी से समाधान निकाला जा सकता है। बोर्ड सैन्य दबाव, आर्थिक प्रतिबंध और कूटनीतिक समझौतों के ज़रिए संघर्षविराम लागू कराने की कोशिश करेगा।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत पहले से ही ‘शांति’, ‘संवाद’ और ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति पर चलता आया है। ऐसे में 8,200 करोड़ रुपये की फीस देकर किसी अमेरिकी नेतृत्व वाले बोर्ड में शामिल होना भारत की विदेश नीति के लिए बड़ा फैसला होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र, गुटनिरपेक्ष नीति और अपनी स्वतंत्र कूटनीति के चश्मे से देखेगा।
आलोचना भी तेज
ट्रंप के इस प्रस्ताव को लेकर कई देशों और कूटनीतिक विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि शांति को “सब्सक्रिप्शन मॉडल” में बदलना अंतरराष्ट्रीय नैतिकता के खिलाफ है।











