(विकास शर्मा :-पत्रकार)
नेपाल की सुरंग से निकली यह कहानी जनता को अंधविश्वास नहीं, बल्कि संतुलन सिखाती है।
आपदा आए तो प्रशासन और विज्ञान पर भरोसा कीजिए। सुरक्षा नियमों का पालन कीजिए। डॉक्टर की जरूरत हो तो इलाज कराइए। रेस्क्यू टीम आए तो उसकी विशेषज्ञता पर विश्वास कीजिए।
लेकिन जब जीवन कठिन हो जाए, तब अपने भीतर की उम्मीद को भी जीवित रखिए।
किसी के लिए वह उम्मीद कृष्ण का नाम हो सकती है, किसी के लिए राम का स्मरण, किसी के लिए अल्लाह की दुआ, किसी के लिए गुरु का संदेश और किसी के लिए परिवार का प्रेम।
नाम अलग हो सकते हैं, लेकिन मनुष्य के भीतर जीने की इच्छा एक ही होती है।
सत्ता को भी समझना होगा यह संदेश
राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता का सबसे बड़ा धर्म केवल शासन करना नहीं, बल्कि संकट में मनुष्य के जीवन की रक्षा करना है।
नेपाल की घटना में यदि रेस्क्यू टीमें अपना संघर्ष छोड़ देतीं, तो केवल प्रार्थना पर्याप्त नहीं होती। उसी प्रकार यदि सुरंग में फंसे व्यक्ति के भीतर संघर्ष की इच्छा समाप्त हो जाती, तो तकनीक के पहुंचने तक उसकी मानसिक शक्ति जवाब दे सकती थी।
इसलिए इस घटना की सबसे तार्किक व्याख्या यही है—
बाहर से बचाव का प्रयास हुआ, भीतर से जीवन ने संघर्ष किया।
और संभवतः यही जीवन और व्यवस्था का सबसे बड़ा संबंध है।
: सत्ता जरूरी है, लेकिन सर्वशक्तिमान नहीं
नेपाल की अंधेरी सुरंग से निकले संजय शाह की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि मनुष्य को केवल बाहरी सत्ता के भरोसे नहीं जीना चाहिए।
व्यवस्था जरूरी है। विज्ञान जरूरी है। सरकार जरूरी है। तकनीक जरूरी है।
लेकिन इंसान को इंसान बनाए रखने के लिए आत्मबल, विश्वास और आध्यात्मिक चेतना भी उतनी ही आवश्यक है।
सत्ता मलबा हटा सकती है,
तकनीक रास्ता बना सकती है,
रेस्क्यू टीम हाथ पकड़कर बाहर ला सकती है,
लेकिन अंधेरे में नौ दिन तक “मैं अभी हार नहीं मानूंगा” कहने की शक्ति—
वह शक्ति मनुष्य के भीतर से ही आती है।
और शायद इसी को कोई आत्मबल, कोई आस्था, और कोई परमसत्ता कहता है।
नेपाल की सुरंग ने दुनिया को यही संदेश दिया है—
“सत्ता जीवन बचाने का प्रयास करती है, लेकिन जीवन को संघर्ष करते रहने की प्रेरणा अक्सर उससे भी गहरी किसी शक्ति से मिलती है।”












